युधिष्ठिर ने कब-कब झूठ बोला | Yudhisthir ne jhuth kab Bola

महाभारत में सबसे सत्यवादी व्यक्ति के रुप में युधिष्ठिर का नाम आता है। युधिष्ठिर को धर्म का ज्ञाता और धर्मराज भी कहा जाता है, वो धर्म के पुत्र भी थे, ऐसा माना जाता है कि युधिष्ठिर कभी भी असत्य और अधर्म के मार्ग पर नहीं चले, वो हमेशा सत्य ही बोलते थे। हम बचपन से यह सुनते आ रहे हैं कि झूठ बोलना पाप है । हमने महाभारत सीरियल में और कई लोगों से सुना है कि युधिष्ठिर ने अपने जीवन में सिर्फ एक बार झूठ बोला, जब द्रोणाचार्य का वध करने का प्रसंग द्रोण पर्व में आता है । लेकिन ये असत्य है इसके अलावा युधिष्ठिर ने पूरे एक वर्ष तक झूठ बोला था, फिर भी उनके उन झूठों को पाप की संज्ञा नहीं दी गई।

अज्ञातवास के दौरान युधिष्ठिर ने कई बार झूठ बोला

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि जुए में कौरवों से हारने के बाद पांडवों को 13 वर्ष का वनवास मिला था। इनमें पांडवों को बारह वर्ष तक जंगल में रहना था और एक वर्ष किसी भी स्थान पर छिप कर अज्ञातवास में रहना था। अगर इस एक वर्ष में वो कौरवों की नजर में आ जाते तो फिर से उन्हें 13 वर्ष का वनवास भोगना पड़ता । ऐसे में पांडवों के पास झूठ बोल कर छिपने के अलावा कोई भी विकल्प नहीं था।

पांडवों ने विराट नगर में बिताया अपना एक वर्ष का अज्ञातवास

जब पांडवों ने 12 वर्ष तक वनवास को सफलतापूर्वक भोग लिया तब उन्हें एक वर्ष के लिए किसी ऐसे स्थान की तलाश थी जहां उन्हें कोई भी पहचान न सके । वो अपना रुप बदल कर एक वर्ष तक किसी ऐसे स्थान पर छिप कर रह सकें जहां उन्हें कोई भी पहचान न सके। इसके लिए युधिष्ठिर ने मत्स्य देश के विराटनगर को चुना । युधिष्ठिर ने अपने चारों भाइयों और पत्नी द्रौपदी के साथ विराट नगर में प्रवेश किया।  लेकिन एक समस्या थी उन्हें यहां एक वर्ष तक दूसरे नाम और पहचान से रहना था , ऐसे में सभी को झूठ बोलना ही पड़ता ।

युधिष्ठिर ने अपना झूठा रुप और नाम बदल लिया

जब पांडवों ने एक वर्ष के अज्ञातवास के लिए मत्स्य राज्य की राजधानी विराट नगर में प्रवेश किया था। उस वक्त युधिष्ठिर ने विराट के राजा को अपना नाम कंक बताया था और कहा था कि वो युधिष्ठिर के साथ पांसा खेलते थे। तो एक तरीके से पूरे वर्ष तक युधिष्ठिर ने अपना झूठा परिचय दिया और झूठ ही बोलते रहे । लेकिन फिर भी इसे झूठ नहीं माना गया । भीम ने अपना नाम बल्लभ बताया और विराट राजा के यहां रसोइये का काम शुरु किया। अर्जुन ने एक हिजड़े का वेश धारण किया और अपना नाम बृहन्न्ला रख कर विराट री राजकुमारी को नृत्य सीखाना शुरु किया । नकुल ने अपना नाम तंतिपाल रखा और सहदेव ने भी अपना नाम बदल लिया। द्रौपदी ने भी अपना नाम बदल कर रानी की सेवा शुरु कर दी ।

ये पांच प्रकार के झूठ पाप नहीं माने जाते

हालांकि सभी पांडवों और द्रौपदी ने अपने नाम और अपनी पहचान बदल कर झूठ बोला लेकिन फिर भी इनके इन झूठों को पाप नहीं माना गया, दरअसल महाभारत के ही आदिपर्व अध्याय 82 के 36वें श्लोक में उन झूठी बातों को पाप की श्रेणी में नहीं रखा गया है जो इन पांच अवसरों पर बोली जाती हैंः

  1. मजाक में बोली गई ऐसी झूठी बात जिससे किसी को कोई भी हानि न हो।
  2. किसी का विवाह तय करते वक्त जिससे उसका विवाह हो सके।
  3. अपनी पत्नी से बोला गया झूठ पाप की श्रेणी में नहीं आता ।
  4. जब आपके प्राण संकट में हों या किसी दूसरे के प्राण संकट में हो, तो प्राणों को बचाने के लिए बोला गया झूठ पाप की श्रेणी में नहीं आता । ये सत्य से भी ज्यादा पवित्र माना जाता है ।
  5. अगर आपका सब कुछ लुट रहा हो, तो उसे बचाने के लिए भी आप अगर झूठ बोलने हैं तो आपको कोई पाप नहीं लगेगा और ये सत्य से श्रेष्ठ होगा।

युधिष्ठिर का झूठ सत्य से भी ज्यादा पवित्र था

इस हिसाब से युधिष्ठिर ने विराट नगर में जो झूठ बोला वो पाप की श्रेणी में नहीं आता था। क्योंकि अगर युधिष्ठिर और बाकी पांडव अपना वास्तविक परिचय दे देते और सत्य संभाषण करते तो सभी पांडवों का अज्ञातवास खत्म हो जाता । उनके प्राण संकट में आ जाते और उनका लुटा हुआ राज्य फिर से प्राप्त नहीं हो पाता

युधिष्ठिर का एक झूठ पाप की श्रेणी में आता है

विराट नगर में युधिष्ठिर के सारे झूठ पाप और अधर्म की श्रेणी में नहीं आये , लेकिन युधिष्ठिर का एक झूठ पाप की श्रेणी में आया । वो झूठ इतिहास में बहुत ही प्रसिद्ध है। कथा आप सभी जानते हैं कि द्रोणाचार्य सिर्फ तब ही युद्ध छोड़ सकते थे जब कोई उनके पुत्र के बारे में कोई अमंगलसूचक बात कह दे।

कृष्ण द्रोण के वध के लिए एक उपाय निकालते हैं। महाभारत के युद्ध में एक हाथी भी था जिसका नाम अश्वत्थामा था। कृष्ण ने भीम को कहा कि वो उस अश्वत्थामा हाथी का वध कर दें और युधिष्ठिर द्रोणाचार्य के पास जाकर कहें कि अश्वत्थामा मारा गया। लेकिन युधिष्ठिर इसके लिए पहले तैयार नहीं होते । तब कृष्ण कहते हैं कि आप सत्य ही कहिए और जा कर बोलिये कि अश्वत्थामा मारा गया लेकिन नर नहीं हाथी

युधिष्ठिर ने सच को झूठ की तरह बोला युधिष्ठिर द्रोण के सामने जाकर यह बात जोर से कहते हैं कि

अश्वत्थामा मारा गया… लेकिन इसके बाद की लाइन वो धीरे से कहते हैं कि नर नहीं हाथी….

इसके बाद सत्यवादी युधिष्ठिर का रथ जो पृथ्वी से चार अंगुल उँचा चलता था वो धरती से चिपक कर चलने लगा इसके बाद द्रोणाचार्य दुखी होकर एक महान युद्ध प्रारंभ करते हैं, लेकिन देवतागण आकर उनसे युद्ध का त्याग करने के लिए कहते हैं। बाद में द्रोण जब ध्यान अवस्था में चले जाते हैं तब धृष्टद्युम्न उनका वध कर देता है।

युधिष्ठिर का झूठा सच द्रोण की मृत्यु की वजह बना

युधिष्ठिर का यह झूठ पाप की श्रेणी में इसलिए आया क्योंकि वो उपर दिये गये पांचो शर्तों से परे है। न तो द्रोण की वजह से युधिष्ठिर और पांडवों के प्राण संकट में थे क्योंकि वो पांचो पांडवो का वध न करने की प्रतिज्ञा ले चुके थे, न ही ये कोई विवाह का अवसर था और न ही युधिष्ठिर ये झूठ अपनी पत्नी से बोल रहे थे। और आखिरी बात की द्रोण की वजह से उनका सर्वस्व लुट नहीं रहा था। न ही द्रोण युधिष्ठिर के राज्य का अपहरण करने वाले थे। यही वजह थी कि युधिष्ठिर का ये झूठ पाप की श्रेणी में आया और अंततः स्वर्ग जाते वक्त उनके पैरों का एक अंगूँठा सड़ गया

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