शुद्ध सनातन धर्म सिर्फ मानवों का धर्म नही रहा है बल्कि इसके दायरे में समस्त चर और अचर जगत के प्राणियों का समावेश है। गाय को सबसे पवित्र और दिव्य प्राणी का दर्जा प्राप्त है। लेकिन इसके अलावा कई अन्य प्राणियों जैसे कुत्ता, बैल, कछुआ, भैंस आदि को भी सनातन धर्म में उचित स्थान मिला है।
देवताओं के वाहन के रुप मे जानवर और पक्षी
सनातन धर्म मे देवी और देवताओं के वाहन के रुप में कई जानवरों को दिखाया गया है। भगवान शिव का वाहन नंदी बैल है, तो विष्णु गरुड़ पक्षी की सवारी करते हैं। मां दुर्गा का वाहन सिंह है तो माता लक्ष्मी उल्लू की सवारी करती हैं। सरस्वती हंसवाहिनी हैं तो यमराज भैंसे की सवारी करते हैं। इन सभी प्राणियों को सनातन धर्म में देवताओं के साथ दिखाया गया है। लेकिन कुछ कुत्तों की महिमा भी सनातन धर्म में गायी गई है।
ऋग्वेद में है कुत्ते की महिमा, कुत्तों का माता सरामा की कथा
सनातन धर्म का प्रारंभ ऋग्वेद से माना जाता है । ऋग्वेद में सरामा नाम की एक कुतिया का वर्णन है, जो सभी कुत्तों की माता कही गई है। सरामा इंद्र के साथ रहने वाली कुतिया है। वो इंद्र के साथ युद्ध में भी जाती है और इंद्र की सहायता भी करती है। ऋग्वेद की एक कथा के अनुसार जब आर्यों के विशेषकर अंगिरा ऋषि के पुत्रों की गायों का दुष्ट पणियों ने अपहरण कर लिया था , तब सरामा कुतिया ने ही इन गायों की खोज की थी । सरामा कुतिया की सहायता से ही इंद्र ने पणियों से वापस उन दिव्य गायों को प्राप्त किया था।
सरामा के लिए ऋग्वेद में कई अच्छी बातें कही गई हैं। सरामा को शुभगा ( जो सबकी प्रिय हो और भाग्यवान हो) , देवशुनि ( देवताओं की पवित्र कुतिया) और सुपदी ( जिसके पैर शुभ हों) कह कर उसकी प्रशंसा की गई है।
सरामा कुतिया ने सिखाया दूध का महत्व
ऋग्वेद की एक ऋचा के अनुसार सरामा कुतिया ने ही मनुष्यों को गाय के दूध का महत्व समझाया और कैसे गाय का दूध निकालते हैं, इसका तरीका भी बताया है। कथा यह है कि इंद्र सरामा से यह वादा करते हैं कि अगर वो गायों को खोज लेगी तो उसका दूध सरामा के वंशजों को भी मिलेगी । इस पर सरामा कहती है कि सिर्फ कुत्तों को ही नहीं मनुष्यों को भी दूध मिलने का आश्वासन इंद्र दें तो वो इस कार्य को करेगी । इंद्र इसके लिए तैयार हो जाते हैं।
रामायण में कुत्तों की कथा
वाल्मीकि रामायण में दो स्थानों पर मुख्य रुप से कुत्तों का वर्णन मिलता है । अयोध्याकांड में जब भरत को उनके मामा दो हजार कुत्ते उपहार में देते हैं ताकि उसे वो अयोध्या ले जा सकें। दूसरी कथा वाल्मीकी रामायण के उत्तरकांड के एक प्रक्षिप्त सर्ग में मिलती है।
कथा यह है कि एक कुत्ता श्रीराम के दरबार में न्याय मांगने के लिए आता है । कुत्ते का आरोप है कि एक ब्राह्म्ण भिक्षु ने अकारण क्रोध में आकर उसका सिर फोड़ दिया है। चूंकि ब्राह्म्ण अवध्य माने गए हैं और उन्हें दंडविधान से छूट मिली हुई है, इसलिए श्रीराम कुत्ते से ही पूछते हैं कि इस ब्राह्म्ण भिक्षु को क्या दंड दिया जाए। कुत्ता श्रीराम से कहता है कि इस ब्राह्म्ण को किसी मठ का महंत बना दिया जाए। ऐसा इसलिए क्योंकि महंत का पद पाप से भरा होता है। महंत ब्राह्म्णों का हक मारते हैं और स्त्रियों और पुरुषों के धन का अपहरण करते हैं। महंत अपने पापों की वजह से कुत्ते के रुप में अगला जन्म लेते हैं।
महाभारत में सरामा कुत्तों की कथा
- महाभारत में भी कुत्तों की लगभग चार कथाएं मिलती हैं। आदि पर्व में एक बार फिर सरामा कुतिया सामने आती है। कथा है कि सरामा कुतिया के बेटे को राजा जनमेजय के यज्ञ में प्रवेश करने की वजह से पीटा जाता है। सरामा इस बात को सुन कर क्रोध से भर जाती है और राजा जनमेजय को शाप दे देती है।
- कुत्ते का दूसरा जिक्र महाभारत के उस प्रसंग में है जब युधिष्ठिर और द्रौपदी एकांत में विहार कर रहे थे। अचानक उनके एकांत को भंग करने के लिए एक कुत्ता आ जाता है। तब युधिष्ठिर उस कुत्ते को शाप देते हैं कि जिस प्रकार उस कुत्ते ने युधिष्ठिर और द्रौपदी को एकांत में संभोग करते देखा है उसी प्रकार कुतों की संभोग क्रिया सार्वजनिक रुप से पूरी देखेगी महाभारत में कुत्ते का तीसरा प्रसंग स्वर्गारोहण पर्व में मिलता है, जब युधिष्ठिर अपने चारों भाइयों और द्रौपदी के साथ सशरीर स्वर्ग प्राप्ति के लिए हिमालय की तरफ चल पड़ते हैं। उनके पीछे -पीछे एक कुत्ता भी चलता है। युधिष्ठिर को छोड़कर सारे लोग रास्तें में ही प्राण त्याग देते हैं लेकिन कुत्ता बच जाता है ।
- जब इंद्र युधिष्ठिर को अकेले सशरीर स्वर्ग ले जाने का प्रस्ताव देते हैं तो युधिष्ठिर ठुकरा देते हैं। युधिष्ठिर कहते हैं कि वो उनके साथ यह कुत्ता भी स्वर्ग जाएगा। बाद में इंद्र मान लेते हैं और कुत्ते को भी स्वर्ग ले जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। तभी वह कुत्ता धर्म के रुप में प्रगट हो जाता है और कहता है कि वो युधिष्ठिर के धर्म की सत्यता को जानना चाहता था।
- महाभारत के एक स्थान पर सरामा को स्कंद के साथ भी जोड़ा गया है और उसे स्कंद की सेना की मात्रिकाओं में स्थान दिया गया है । सरामा इस रुप में बच्चों का मांस खाने वाली दिखाई गई है।
सरामा कुतिया और उसके वंशज
ऋग्वेद में सरामा कुतिया के दो पुत्रों श्यामा और सबला का उल्लेख आता है। बाद के ग्रथों में सरामा के पति के रुप में शिशिर का नाम आता है। बाद के ग्रंथो में ही सरामा के चार पुत्रों -श्यामा, सबला,अबला और ऋजी का नाम आता है । इन चारों को यमराज के साथ दिखाया गया है। ये कुत्ते बच्चों को जुकाम का रोग देते हैं। बाद के कुछ अन्य ग्रंथों में सरामा कुतिया को सभी कुत्तों का वँशज माना जाने लगा । भागवत पुराण में सरामा को प्रजापति दक्ष की पुत्रियों में एक बताया गया है जिनका विवाह कश्यप से हुआ था और वो ही सारे कुत्तों की प्रजाति की जननी है।
सरामा को ऋगेवद में एक इमानदार कुतिया के रुप में दिखाया गया है। ऋग्वेद के दशम मंडल की एक ऋचा के अनुसार जब गायों को खोजते हुए सरामा पणियों के पास पहुंचती है तो पणि उसे मांस के रुप में रिश्वत देने का प्रयास करते हैं , जिसे सरामा ठुकरा देती है।