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हनुमान जी अमर हैं | कहां मिलेंगे हनुमान |What is the address of Hanuman

सनातन धर्म के आठ चिरंजीवियों में हनुमान जी भी हैं। चिरंजीवी हनुमान आज भी जीवित हैं, लेकिन वो अगर जीवित हैं, तो हनुमान जी के घर का पता क्या है? हनुमान जी किस स्थान पर रहते हैं? कहां मिलेंगे हनुमान?  हनुमान जी के साथ वर्तमान में कौन- कौन रहता है? हनुमान जी क्या खाते हैं और क्या करते हैं? इन सभी प्रश्नों का उत्तर आज मिलेगा ।वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस और दूसरी रामकथाओं में हनुमान जी के जन्म और उनके चिरंजीवी होने की कथा मिलती है। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में हनुमान जी को चिरंजीवी होने का वरदान मिलने की कथा भी आती है।

जब हनुमान (Hanuman) जी की मृत्यु हो गई

वाल्मीकि रामायण की कथा के अनुसार जब बालक हनुमान ने सूर्य को लाल फल समझ कर उसे खाने की चेष्टा की तो उस वक्त इंद्र के वज्र के प्रहार से वो मृत हो गए। हनुमान को मरा हुआ देख कर उनके पिता पवन पुत्र क्रोधित हो गए और उन्होंने संसार में वायु का प्रवाह रोक दिया । इससे पूरे संसार में खलबली मच गई और सभी देवता पवन देव के पास आकर प्रार्थना करने लगे । 

हनुमान (Hanuman) जी जीवित हो गए

ब्रह्मा जी ने पवनदेव को प्रसन्न करने के लिए हनुमान जी को फिर से जीवित कर दिया। इसके बाद ब्रह्मा जी के कहने पर सभी देवताओं ने हनुमान जी को कई वरदान दिये। इंद्र ने हनुमान जी का नामकरण किया और कहा – 

मत्करोतसृष्टव्रजेण हनुरस्य यथा हतः
नाम्ना वै कपिशार्दूलो भविता हनुमानिति।।

 अर्थात – मेरे हाथ से छूटे हुए वज्र के द्वारा इस बालक की हनु( हड्डी) टूट गई थी, इस लिए इस कपिश्रेष्ठ का नाम हनुमान होगा।

इसके बाद इंद्र ने हनुमान को वरदान देते हुए कहा कि –

 अहमस्य प्रदास्यामि परमं वरद्भुतम् । इतः प्रभृति वज्रस्य ममावध्यो भविष्यति।।

अर्थात- इसके सिवा मैं (इंद्र) इसे (हनुमान) दूसरा अद्भुत वर यह देता हूँ कि आज से यह मेरे वज्र के द्वारा भी नहीं मारा जा सकेगा।

इसके बाद वरुण देवता ने भी हनुमान जी को वर देते हुए कहा कि –

वरुणश्च वरं प्रादान्नास्य मृत्युर्भविष्यति। वर्षायुतशतेनापि मत्पाशादुदकादपि।।

अर्थात- तत्पश्चात वरुण देव ने वर देते हुए कहा कि – दस लाख वर्षों की आयु होने के बाद भी मेरे पाश और जल से इस बालक की मृत्यु नहीं होगी।

इंद्र और वरुण के द्वारा अवध्य बना दिये जाने के बाद यमराज ने भी हनुमान जी को वरदान दिया और साथ में कुबेर ने भी हनुमान जी को एक वरदान देते  हुए कहा कि – 

यमो दण्डावध्यत्वमरोगत्वं च दत्तवान। वरं ददामि संतुष्ट अविषादं च संयुगे।।
गदेयं मामिलाा नैनं संयुगेषु वधिष्यति। इत्येवं धनदः प्राह तदा ह्वेकाक्षिपिंगलः।।

अर्थातः- फिर यम ने वर दिया- यह बालक मेरे दण्ड से अवध्य और निरोग होगा’। इसके बाद पिंगलवर्ण की एक आँख वाले कुबेर ने कहा – मैं संतुष्ट होकर यह वर देता हूँ कि युद्ध में इसे कभी विषाद नहीं होगा और मेरी यह गदा संग्राम में इसका वध न कर सकेगी।

भगवान शंकर ने हनुमान जी को वरदान दिया

इसके बाद भगवान शँकर ने भी हनुमान जी को यह यह वर दिया कि ‘यह मेरे और मेरे आयुधों के द्वारा भी अवध्य होगा।’ शिल्पियों में श्रेष्ठ विश्वकर्मा ने वर देते हुए कहा कि  “मेरे द्वारा बनाए गए जितने भी अस्त्र- शस्त्र हैं, उनसे यह अवध्य होकर चिरंजीवी होगा ।” अंत में ब्रह्मा जी ने भी हनुमान जी को वर देते हुए कहा कि “यह मेरे ब्रह्मास्त्र से भी नहीं मारा जा सकेगा ।”

सीता ने हनुमान जी को अमरता का वरदान दिया 

इस प्रकार हम देखते हैं कि हनुमान जी को बचपन में ही चिरंजीवी होने का वरदान मिल गया था। लेकिन रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने चिंरजीवी हनुमान जी को अमर बना दिया । हनुमान जी को अमर होने का वरदान माता सीता देती हैं – 

अजर अमर गुननिधि सुत होउ। करहु बहुत रघुनायक छोहूं।

अर्थात – सीता कहती हैं कि ‘हे हनुमान! तुम बुढ़ापे से रहित रहो और अमर हो जाओ। तुम पर श्रीराम हमेशा स्नेह करते रहें।’ 

चिरंजीवी एक प्रकार के लंबी उम्र प्राप्त करने के समान है, लेकिन अमरता के वरदान के तहत किसी की मृत्यु कभी भी नहीं होती। श्रीराम ने हनुमान जी को चिरंजीवी होने का वरदान दिया । महाभारत में कई चिरंजीवियों का वर्णन है जो दीर्घ काल तक जीवन जीने के बाद मृत्यु को प्राप्त हुए। इन चिरंजीवियों में ऋषि बक और राजा इंद्रद्युम्न का नाम आता है जो चिरंजीवी थे और बाद में मृत्यु को प्राप्त हुए। इसलिए चिरंजीवी से अमर होने का अर्थ नहीं निकाला जा सकता है।

वाल्मीकि रामायण में उत्तरकांड में ही श्रीराम और हनुमान जी के बीच वार्तालाप होता है । हनुमान जी श्रीराम से उनकी अक्षय भक्ति का वरदान मांगते हैं –

स्नेहो मे परमो राजंस्तवयि तिष्ठतु नित्यदा । भक्तिश्च नियता वीर भावो नान्यत्र गच्छतु ।।
यावद् रामकथा वीर चरिष्यति महीतले। तावच्छरीरे वत्स्यन्तु प्राणा मम न संशय ।।
यच्चैतच्चरितं दिव्यं कथा ते रघुनंदन । तन्माप्सरसो राम श्रावयेयुर्नर्षभ ।।

अर्थः हनुमान जी श्रीराम से कहते हैं “महाराज आपके प्रति मेरा स्नेह हमेशा बना रहे । वीर ! आप में ही मेरी निश्चल भक्ति रहे । आपके सिवा और कहीं मेरा आंतरिक अनुराग न हो । वीर श्रीराम ! इस पृथ्वी पर जब तक राम कथा प्रचलित रहे , तब तक निःसंदेह मेरे प्राण इस शरीर में ही बसे रहें। रघुनंदन नरश्रेष्ठ श्रीराम ! आपका जो यह दिव्य चरित्र और कथा है, इसे अप्सराएं गा कर मुझे सुनाया करें।”

हनुमान जी के ऐसा कहने पर श्रीराम ने श्रेष्ठ सिंहासन से उठ कर  हनुमान को अपने गले से लगा लिया और स्नेहपूर्वक इस प्रकार कहा – 

एवमेतत् कपिश्रेष्ठ भविता नात्र संशयः । चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका ।।
तावत् ते भविता कीर्तिः शरीरेSप्यसवस्तथा। का हि यावत्स्थास्यन्ति तावत् स्थास्यन्ति मे कथा।।

अर्थातः- “कपिश्रेष्ठ ! ऐसा ही होगा , इसमें संशय नहीं है। संसार में जब तक मेरी कथा प्रचलित रहेगी, तब तक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी और तुम्हारे शरीर में प्राण भी रहेंगे । जब तक ये लोक बने रहेंगे , तब तक मेरी कथाएं भी स्थिर रहेंगी।”

महाभारत में है हनुमान जी के घर का पता

इसके बाद श्रीराम ने हनुमान जी को विदा किया । लेकिन इसके बाद हनुमान जी कहां गए और किस स्थान पर वास करने लगे यह बात वाल्मीकि रामायण में नहीं मिलती है। इसका पता सबसे पहले महाभारत के वन पर्व में मिलता है जब भीमसेन की मुलाकात हनुमान जी से होती है। 

महाभारत के वन पर्व के अध्याय 145 से 151 में कथा है कि जब अर्जुन स्वर्ग से लौटने वाले थे तो उनसे मिलने के लिए युधिष्ठिर , द्रौपदी, भीम , नकुल और सहदेव वर्तमान उत्तराखंड राज्य स्थित गंधमादन पर्वत की तरफ गए । वहां उन्होंने बद्रिकाश्रम या बद्रीनाथ धाम जाकर नर- नारायण की पूजा की । उसी वक्त अचानक तेज हवा से कुछ दिव्य कमल के पुष्प द्रौपदी के पास आकर गिर गए । द्रौपदी ने भीम से ऐसे हजार पुष्प लाने के लिए कहा । 

भीम ने खोजा हनुमान जी का निवास स्थान 

भीम द्रौपदी की इच्छा पूरी करने के लिए बद्रीनाथ धाम से आगे बढ़े । गंधमादन पर्वत के पास ही स्थित एक अन्य पर्वत के पास जब भीम पहुंचे तो उन्हें वहां एक वन दिखाई दिया। उस वन में एक सरोवर था जिसमें उतर कर भीम स्नान करने लगे । स्नान कर भीम ने उस वन में प्रवेश किया जो कदली वन के नाम से प्रसिद्ध था । इस कदली वन से होकर ही स्वर्ग जाने का मार्ग खुलता है। 

उत्तराखँड राज्य के कदली वन में रहते हैं हनुमान जी

जब भीम कदली वन में पहुंचे और स्वर्ग जाने के मार्ग की तरफ बढ़े तो मार्ग में हनुमान जी ने उनका रास्ता रोक दिया- 

तं तु नादं ततः श्रुत्वा मुक्तं वानरपुंगवे।
भ्रातरं भीमसेनं तु विज्ञाय हनुमान कपिः।।

 अर्थात- बड़े बड़े गजराजों का चित्कार सुन कर कपिप्रवर हनुमान जी जो उस समय कदली वन में ही रहते थे, यह समझ गए कि उनके भाई भीमसेन आ गए हैं। 

कदलीवन में आए अपने भाई भीमसेन को देखकर हनुमान जी ने सोचा कि कहीं वो स्वर्ग के रास्ते पर न चल पड़ें और उन्हें कोई शाप न दे दे, इसलिए वो मार्ग रोक कर बैठ गए ।इसके बाद भीमसेन और हनुमान जी के बीच वार्तालाप होती है ।

हनुमान जी और भीमसेन की मुलाकात

 भीमसेन हनुमान जी से मार्ग छोड़ने के लिए कहते हैं। लेकिन हनुमान जी के द्वारा इंकार किए जाने पर भीमसेन को गुस्सा आ जाता है और वो उनकी पूँछ को हटाने की कोशिश करते हैं। जब भीमसेन हनुमान जी की पूँछ हिला नहीं पाते तो वो उनसे उनका परिचय पूछते हैं। तब हनुमान जी अपना परिचय देते हुए अपनी कथा बताते हैं। हनुमान जी यह भी बताते हैं कि इस पर्वत पर मनुष्यों का आना मना है। 

आज भी कदली वन है हनुमान जी का  पता

हनुमान जी भीमसेन को पूरी रामकथा बताते हैं और कहते हैं कि माता सीता के आशीर्वाद से वो कदली वन में ही रहते हैं और उन्हें नित्य दिव्य भोग प्राप्त होते रहते हैं- 

सीताप्रसादाच्च सदा ममिहस्थमरिंदम। उपतिष्ठंति दिव्या हि भोगा भीम यथेप्सिता।

हनुमान जी अपने वर्तमान घर कदली वन की विेशेषता बताते हुए कहते हैं कि इस स्थान पर कोई भी मनुष्य नहीं आ सकता और यहां नित्य अप्सराएं और गंधर्व श्रीराम की कथा सुनाकर हनुमान जी को आनंदित करती रहती हैं – 

तदिहाप्सरसस्तात गन्धर्वाश्च सदानघ । तस्य वीरस्य चरितं गायन्तो रमयन्ति माम ।।

भागवत पुराण में हनुमान जी के निवास स्थान की कथा

ऐसा ही एक श्लोक श्रीमद् भागवत पुराण में भी मिलता है । श्रीमद भागवत पुराण के अनुसार बद्रीनाथ धाम, गंधमादन पर्वत और कदली वन का क्षेत्र किम्पुरुष खंड या क्षेत्र के नाम से जाना जाता है । यहीं हनुमान जी निवास करते हैं – 

किम्पुरुषे वर्षे भगवन्तमादिपुरुषं लक्ष्मणाग्रजं
सीताभिरामं तच्चरणसंनिकर्षाभिरतः परमभागवतो
हनुमान् सह किम्पुरुषैः अविरभक्तिरुपास्ते।
आर्षष्टिषेणेन सह गन्धर्वैरनुगीयमानां
परमकल्याणीं भतृभगत्कथां सुमुपश्रृणोति सवयं चेदं गायति।

अर्थः किम्पुरुष खंड (क्षेत्र ) में श्री लक्ष्मण जी के बड़े भाई, आदि पुरुष, सीता के हद्य में बसने वाले भगवान श्रीराम के चरणों की सन्निधि के रसिक परमभागवत श्रीहनुमान जी अन्य किन्नरों सहित अविचल भक्ति भाव से श्रीराम की उपासना करते हैं।

वहां अन्य गंधर्वों सहित आर्ष्टिषेण उनके स्वामी श्रीराम की परम कल्याणमयी गुणगाथा गाते रहते हैं। श्रीहनुमान जी उसे सुनते हैं और स्वयं भी इस मंत्र का जाप करते हुए इस प्रकार श्रीराम की स्तुति करते हैं। 

हनुमान जी के कदली वन की विशेषता

महाभारत में हनुमान जी ने अपने रहने के स्थान कदली वन की विशेषता बताई है । यहां कोई मनुष्य नहीं आ सकता है । यहां सिर्फ कुबेर के भेजे हुए गंधर्व और अप्सराओं का प्रवेश है । इस स्थान पर यक्ष स्त्रियां  और अप्सराएं नृत्य करती हैं। यहां विभिन्न प्रकार के फलों और फूलों के वृक्षों की भरमार है । इन पर लगने वाले फल कभी खत्म नहीं होते । यहां केलों की भरमार है और इनका रंग सुर्वण के जैसा है । सरोवरों में कमल खिले हुए हैं। यहां कदली के वृक्षों की भरमार होने की वजह से इसका नाम कदली वन पड़ा है। यहीं से देवलोक जाने का मार्ग खुलता है।

कदली वन वर्तमान उत्तराखंड के ब्रदीनाथ धाम के आगे स्थित है। यह एक रहस्यमय प्रदेश है जहां यह पता करना बहुत मुश्किल है कि कदली वन वास्तविक रुप से किस स्थान पर है । लेकिन गंधमादन पर्वत के आस पास का जो इलाका है वहीं पर कदली वन और सौगंधिक वन हैं, यह एक निश्चित बात है। यहीं पर कोई हनुमान भक्त पहुंच कर हनुमान की कृपा से उनका दर्शन कर सकता है। 

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